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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

कुछ अनकही बाते

 सबके अपने बचपन की कहानी, किस्से होते है लेकिन आशू उसका बचपन ? हम्म कैसा था उसका बचपन ? 

जब भी पीछे मुड़कर अतीत में झाक कर देखती हु टटोलती हूं अपने बचपन कहा है ? कुछ नही मिलता कुछ दर्द के सिवा बचपन था ही कहा उसका ?? शायद उम्र से पहले बड़े होने का अभिशाप मिला था आशू को नन्ही आशू जबसे कुछ समझ आया तब बस एक ही सवाल होता मां ऐसी क्यों है उसकी दूसरों की तो नही है ऐसी ... कभी उसे पास नही लेती हमेशा दुत्कार देती ..आशू ढूंढती रहती प्रेम को ममत्व को क्या ही चाहिए होता उसे प्रेम बस और कुछ भी तो नहीं .. 

बड़े होकर भी बस शायद उसने वही ढूंढा ..पता नहीं शायद कुछ आत्माएं शापित होती हैं और अब आशू खुद पत्थर हो गई ...


अब उसे खुद से, प्रेम से नफरत है बेहद नफरत ...!!

और उसकी संवेदनाएं जैसे मर गई है ..खुद को पाषाण बनते देख उसकी आत्मा भी मर गई शायद यही ठीक है यही


 नियति है ...!!




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