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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

New year

 ‍‍कुछ पलों में नया साल शुरू हो जाएगा..पूरे दिन सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने वक्तव्य लिखते रहे अपने जीवन के बारे में, जो अब तक उन्होंने जीया है..किसी ने इस साल की अपनी कोई आख़िरी तस्वीर चस्पा की, किसी ने अपनी कोई कविता..

मैंने ना तस्वीर खींची, ना कोई कविता लिखी है और ना ही मैं इस साल से जुड़ा हुआ कुछ लिखने वाली हूँ..शब्द नहीं हैं, या कहिए कि मैं ये सब लिख नहीं सकती.. सिर्फ़ भरने के लिए या सिर्फ़ कुछ लिखने के लिए मुझसे नहीं लिखा जाता.. अलग-अलग मनोदशाएँ लोगों की इस वक़्त हैं... और मेरी हमेशा की 'खालीपन' की दशा है, कुछ भी भरा हुआ नहीं है..और मैं शायद बचपन से कभी भर नही पाई .. मां के जाने बाद अकेले खाली रहने की आदत को कभी भर नही पाई ..हां लोग मुझे इस आदत की वजह  मूडी ,सायकिक जरूर कहते है .. पहले फरक पड़ता था इन सब बातो का अब आदत हो गई है .. कहते है हम अगर किसी चीज से छुटकारा पाना चाहते है तो उसे अपने जीवन का अंग बना लो वही मैने किया अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए उसे अपना बना लिया.. हां एक वक्त था जब लगता था कोई हमसे हमारे होने के लिए प्यार करे पर हम उस वक्त ये भूल जाते थे जिसका होना अपने पिता के लिए एक सरदर्द है उसे कोई कैसे उसके होने के लिए प्रेम भी कर सकता है ! अब वो ख्वाहिश भी हमने कहीं दफना दी है !!

मैं ख़ुद के निजी अनुभव, एहसास, संघर्ष को शायद ही कभी लिखूँगी...या शायद ऐसा कोई साल या दशक कभी नहीं आएगा जब मैं ख़ुद के बारे में लिखने बैठूँगी.. मुझे लगता है जिस दिन ख़ुद को लिखा उस दिन मैं लिखने को भूल जाऊँगी, ये मेरा निजी तौर पर मानना है...किसी दिन सुकून से सब मंज़िल, दोस्त, सबसे परे अकेले, एकदम अकेले बस शीशे पर से बारिश की उतरती बूँदों को देख कर बैकग्राउंड में "अगर तुम साथ हो" गाना सुनते हुए हल्की-सी आँखें नम करनी हैं... जिस दिन ये हो जाएगा उस दिन कुछ नया ज़रूर लगेगा तब तक हर साल, हर आने वाला दशक बस उम्र का बढ़ता हुआ एक नंबर है...!

खैर नया साल मुबारक सबको !! 


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